सूत्रों के अनुसार, संबंधित ग्राम पंचायतों में मनरेगा कार्यों के दौरान ऐसे कई नाम दर्ज किए गए हैं जो महीनों से बाहर काम कर रहे हैं। सवाल उठ रहा है कि जब मजदूर गांव में उपस्थित ही नहीं हैं तो उनकी उपस्थिति किस आधार पर लगाई जा रही है? इससे सरकारी धन के दुरुपयोग की आशंका गहरा रही है।
ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि ब्लॉक स्तर पर निगरानी व्यवस्था कमजोर है और एपीओ (सहायक कार्यक्रम अधिकारी) की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। यदि जांच निष्पक्ष रूप से कराई जाए तो बड़े स्तर पर फर्जीवाड़ा सामने आ सकता है।
मनरेगा जैसी योजना, जो गरीब और जरूरतमंद मजदूरों को रोजगार देने के लिए बनाई गई है, उसमें इस प्रकार की अनियमितता योजना की मंशा पर ही प्रश्नचिह्न खड़ा करती है। ग्रामीणों ने जिलाधिकारी से मांग की है कि पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए, संबंधित अधिकारियों व कर्मियों की जिम्मेदारी तय की जाए और दोषियों पर सख्त कार्रवाई हो।
अब देखना यह है कि जिला प्रशासन इस गंभीर मामले को कितनी गंभीरता से लेता है और क्या वाकई हकीकत सामने लाने के लिए ठोस कदम उठाए जाते हैं।
ब्यूरो रिपोर्ट- फैमी अब्बास
