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Thursday, 3 September 2026

September 03, 2026

RGPV का होगा पुनर्गठन, राजीव गांधी नाम हटेगा; MP कैबिनेट का बड़ा फैसला, तीन तकनीकी विश्वविद्यालय बनेंगे


मध्य प्रदेश की मोहन यादव सरकार ने तकनीकी शिक्षा को लेकर बड़ा फैसला लिया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (RGPV), भोपाल के पुनर्गठन के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई है। इसके तहत मौजूदा RGPV को तीन अलग-अलग तकनीकी एवं कौशल विश्वविद्यालयों में बांटा जाएगा।

इस बदलाव के बाद RGPV का मौजूदा नाम और ढांचा दोनों बदल जाएंगे। नए विश्वविद्यालय क्षेत्रीय नामों से संचालित होंगे। सरकार का कहना है कि इस फैसले का मकसद तकनीकी शिक्षा को क्षेत्रीय स्तर पर मजबूत करना, प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाना और अलग-अलग क्षेत्रों में संतुलित विकास को बढ़ावा देना है।

RGPV के तीन हिस्से होंगे

कैबिनेट के फैसले के मुताबिक, मौजूदा RGPV के भोपाल परिसर को मध्य भारत प्रौद्योगिकी एवं कौशल विश्वविद्यालय के रूप में विकसित किया जाएगा।

वहीं, उज्जैन के स्वशासी इंजीनियरिंग कॉलेज को मालवा प्रौद्योगिकी एवं कौशल विश्वविद्यालय और जबलपुर के स्वशासी इंजीनियरिंग कॉलेज को महाकौशल प्रौद्योगिकी एवं कौशल विश्वविद्यालय के रूप में विकसित किया जाएगा।

तीनों विश्वविद्यालयों के संचालन के लिए अलग-अलग अधिनियम बनाए जाएंगे। इसके बाद RGPV से संबद्ध तकनीकी संस्थानों का प्रशासन एक केंद्रीय विश्वविद्यालय के बजाय संबंधित क्षेत्रीय विश्वविद्यालयों के माध्यम से किया जाएगा।

राजीव गांधी के नाम पर भी बड़ा बदलाव

RGPV के पुनर्गठन के साथ विश्वविद्यालय के नाम में भी बदलाव होगा। नए विश्वविद्यालयों का संचालन क्षेत्रीय नामों से किया जाएगा, यानी मौजूदा ‘राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय’ नाम समाप्त हो जाएगा।

हालांकि, नाम और प्रशासनिक ढांचे में यह बदलाव नए कानून और संबंधित प्रशासनिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद लागू होगा।

अभी RGPV के तहत कितने कॉलेज और छात्र?

मौजूदा व्यवस्था में RGPV से करीब 585 संस्थान संबद्ध हैं और इनमें 3.83 लाख से अधिक विद्यार्थी पढ़ाई कर रहे हैं। विश्वविद्यालय के दायरे में तकनीकी शिक्षा से जुड़े 13 पाठ्यक्रमों के संस्थान शामिल हैं।

इतनी बड़ी संख्या में संस्थानों और छात्रों को एक ही प्रशासनिक ढांचे के तहत संचालित करने के बजाय सरकार ने क्षेत्रीय विश्वविद्यालयों की व्यवस्था बनाने का फैसला किया है।

सरकार ने RGPV को तीन हिस्सों में क्यों बांटा?

सरकार के मुताबिक, RGPV के पुनर्गठन का मुख्य उद्देश्य तकनीकी शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करना और प्रशासनिक दक्षता बढ़ाना है।

नए क्षेत्रीय विश्वविद्यालय बनने से संबंधित क्षेत्रों के कॉलेजों और संस्थानों पर अधिक केंद्रित तरीके से काम किया जा सकेगा। इससे कॉलेजों की संबद्धता, परीक्षा व्यवस्था, शैक्षणिक प्रबंधन और अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं को क्षेत्रीय स्तर पर संचालित करने में मदद मिलने की उम्मीद है।

छात्रों और कॉलेजों पर क्या पड़ेगा असर?

RGPV से जुड़े हजारों छात्रों और कॉलेजों के लिए यह बदलाव महत्वपूर्ण होगा। तीन नए विश्वविद्यालय बनने के बाद संस्थानों को उनके संबंधित क्षेत्र के आधार पर नए विश्वविद्यालयों से संबद्ध किया जाएगा।

इसका असर कॉलेजों की संबद्धता, परीक्षा, डिग्री, प्रशासनिक कामकाज और अन्य शैक्षणिक प्रक्रियाओं पर पड़ सकता है। हालांकि, छात्रों और कॉलेजों के लिए नई व्यवस्था की पूरी तस्वीर नए अधिनियम और सरकार की आगामी अधिसूचनाओं के बाद स्पष्ट होगी।

41 हजार करोड़ रुपये से अधिक के प्रस्तावों को मंजूरी

RGPV के पुनर्गठन के अलावा कैबिनेट बैठक में करीब 41 हजार करोड़ रुपये के विभिन्न विकास और वित्तीय प्रस्तावों को भी मंजूरी दी गई।

इनमें ग्रामीण विकास, डेयरी सहकारिता, सड़क और तकनीकी शिक्षा से जुड़े प्रस्ताव शामिल हैं। सरकार ने ग्रामीण विकास योजना के लिए करीब 29,619 करोड़ रुपये, डेयरी सहकारिता और सांची ब्रांड को मजबूत करने के लिए 2,973 करोड़ रुपये तथा पश्चिम भोपाल बायपास के लिए करीब 3,774 करोड़ रुपये के प्रस्ताव को मंजूरी दी है।

इस तरह RGPV के पुनर्गठन के साथ ही मध्य प्रदेश सरकार ने तकनीकी शिक्षा और बुनियादी ढांचे से जुड़े कई बड़े फैसलों को भी कैबिनेट की मंजूरी दी है।

September 03, 2026

बिहार और झारखंड ने कैसे सुलझाया 25 साल पुराना सोन नदी विवाद? जानिए समझौते की पूरी खबर।

बिहार और झारखंड के बीच सोन नदी के पानी के बंटवारे को लेकर करीब 25 वर्षों से चला आ रहा विवाद अब खत्म हो गया है। सोमवार को नई दिल्ली में दोनों राज्यों के बीच एक अंतर-राज्यीय समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए। समझौते के तहत सोन नदी के कुल जल आवंटन में से बिहार को 5.75 मिलियन एकड़-फीट (MAF) और झारखंड को 2 MAF पानी देने पर सहमति बनी है। इस समझौते को दोनों राज्यों के लिए अहम माना जा रहा है। इससे दक्षिण बिहार के सिंचाई क्षेत्र को फायदा मिलने के साथ ही झारखंड के सूखा प्रभावित पलामू और गढ़वा इलाकों में जल परियोजनाओं को आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हो सकता है।आखिर 25 साल से क्यों अटका था विवाद? सोन नदी के पानी के बंटवारे का विवाद नवंबर 2000 में झारखंड के बिहार से अलग होकर नया राज्य बनने के बाद शुरू हुआ। राज्य के बंटवारे के बाद सोन नदी का ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र और उसकी कई सहायक नदियां झारखंड में चली गईं, जबकि नदी के निचले मैदानी और प्रमुख कृषि क्षेत्र बिहार में रह गए।

हालांकि, इस विवाद की पृष्ठभूमि इससे भी पुरानी है। वर्ष 1973 के बाणसागर समझौते के तहत मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और तत्कालीन अविभाजित बिहार के बीच सोन नदी के पानी का बंटवारा हुआ था। इसमें अविभाजित बिहार को कुल 7.75 MAF पानी आवंटित किया गया था।

लेकिन 2000 में बिहार के विभाजन के बाद इस 7.75 MAF हिस्से को बिहार और झारखंड के बीच किस अनुपात में बांटा जाए, इसे लेकर कोई स्पष्ट कानूनी और बाध्यकारी व्यवस्था नहीं थी। यही आगे चलकर दोनों राज्यों के बीच विवाद की बड़ी वजह बनी।

बातचीत होती रही, लेकिन नहीं बनी बात

पिछले करीब ढाई दशकों में विवाद सुलझाने के लिए कई अंतर-राज्यीय समितियों और अधिकारियों के स्तर पर बातचीत हुई। हालांकि, जलाशय की ऊंचाई, संभावित जलमग्न क्षेत्र, विस्थापन और दोनों राज्यों के हिस्से के पानी जैसे मुद्दों पर सहमति नहीं बन पाई।

बिहार की चिंता थी कि सोन नहर प्रणाली में पर्याप्त पानी नहीं मिलने से उसके कृषि क्षेत्रों की सिंचाई प्रभावित होती है। दूसरी ओर, झारखंड को आशंका थी कि जलाशय का जलस्तर या बांध की ऊंचाई बढ़ाने से पलामू और गढ़वा के कुछ इलाकों में जमीन डूब सकती है और लोगों का विस्थापन हो सकता है।

राजनीतिक स्तर पर भी अलग-अलग समय में दोनों राज्यों में अलग गठबंधन की सरकारें रहने के कारण इस मुद्दे पर अंतिम सहमति बनने में देरी हुई।

कैसे बनी 5.75 MAF और 2 MAF पर सहमति?

नए समझौते के तहत बिहार को 5.75 MAF और झारखंड को 2 MAF पानी देने पर सहमति बनी है। इसके साथ ही जलाशय के जलस्तर को एक निर्धारित सीमा में रखने और संभावित प्रभावित क्षेत्रों के लिए पुनर्वास के प्रावधानों पर भी सहमति बनी है।

इस समझौते से इंद्रपुरी बराज के संचालन और उससे जुड़ी सिंचाई व्यवस्था को भी मजबूती मिलने की उम्मीद है। यह बराज रोहतास जिले में डेहरी-ऑन-सोन से करीब 5 किलोमीटर ऊपर स्थित है और सोन नहर प्रणाली का प्रमुख स्रोत है।

इंद्रपुरी बराज से निकलने वाली नहरों के जरिए रोहतास, भोजपुर, बक्सर और कैमूर समेत शाहाबाद क्षेत्र के बड़े हिस्से में सिंचाई होती है। समझौते के बाद बिहार को कृषि क्षेत्र के लिए अतिरिक्त पानी उपलब्ध होने की उम्मीद है।

झारखंड को क्या फायदा होगा?

समझौते से झारखंड के सूखा प्रभावित पलामू और गढ़वा जिलों के लिए भी पानी की उपलब्धता बढ़ाने का रास्ता साफ हो सकता है। यहां नई नहर प्रणालियों और जल प्रबंधन से जुड़ी परियोजनाओं को आगे बढ़ाने की उम्मीद है।

वहीं, जलाशय का जलस्तर नियंत्रित रखने और पुनर्वास से जुड़े प्रावधानों के कारण संभावित जलमग्नता और विस्थापन की झारखंड की चिंता को भी संबोधित करने की कोशिश की गई है।

केंद्रीय जल आयोग की क्या रही भूमिका?

इस लंबे विवाद को सुलझाने में केंद्रीय जल आयोग (CWC) की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। आयोग ने दोनों राज्यों की पानी से जुड़ी जरूरतों को ध्यान में रखते हुए तकनीकी और जल-विज्ञान संबंधी अध्ययन किए। इसके आधार पर जल प्रबंधन और जलाशय के संचालन से जुड़े प्रस्ताव तैयार किए गए।

पहले भी कई बार मध्यस्थता के प्रयास हुए थे, लेकिन अंतिम सहमति नहीं बन सकी। इस बार दोनों राज्यों के बीच राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर बनी सहमति के साथ तकनीकी समाधान भी तैयार किया गया।

समझौते का क्या होगा असर?

सोन नदी जल विवाद के समाधान से दोनों राज्यों की लंबे समय से लंबित सिंचाई और जल परियोजनाओं को गति मिलने की उम्मीद है।

बिहार को सोन नहर प्रणाली के जरिए सिंचाई के लिए अधिक सुनिश्चित जल उपलब्धता मिल सकती है।

दक्षिण बिहार के रोहतास, भोजपुर और औरंगाबाद जैसे क्षेत्रों को फायदा होने की उम्मीद है।

झारखंड के पलामू और गढ़वा जैसे सूखा प्रभावित जिलों में नई जल परियोजनाओं का रास्ता खुल सकता है।

जलाशय के जलस्तर और पुनर्वास को लेकर झारखंड की चिंताओं के समाधान की व्यवस्था की गई है। 25 साल पुराने अंतर-राज्यीय विवाद के खत्म होने से दोनों राज्यों के बीच जल संसाधनों के बेहतर प्रबंधन की उम्मीद बढ़ी है।

Wednesday, 2 September 2026

September 02, 2026

हाईकोर्ट में 62 तो जिला अदालत में क्यों नहीं? जजों की रिटायरमेंट उम्र बढ़ाने पर सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों से मांगी रिपोर्ट

Supreme Court on Retirement Age: जिला न्यायपालिका के न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति की उम्र बढ़ाने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर राज्यों से सकारात्मक रुख अपनाने को कहा है। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से जिला अदालतों में कार्यरत न्यायिक अधिकारियों की रिटायरमेंट उम्र 62 साल करने के प्रस्ताव पर विचार करने को कहा है।पीठ में न्यायमूर्ति जायमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल हैं। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्यायिक अधिकारी आम सरकारी कर्मचारियों की तुलना में अपेक्षाकृत देर से सेवा में आते हैं। ऐसे में उन्हें 62 वर्ष की उम्र तक सेवा में बनाए रखने से राज्यों पर कोई अतिरिक्त वित्तीय बोझ नहीं पड़ेगा।राज्यों की वित्तीय दलील पर सुप्रीम कोर्ट की दो टूक

कुछ राज्यों ने जिला न्यायपालिका के अधिकारियों की सेवानिवृत्ति उम्र बढ़ाने पर आपत्ति जताते हुए कहा कि उनके यहां अन्य सरकारी कर्मचारियों की रिटायरमेंट उम्र 58 या 60 साल है। नगालैंड ने भी इसी आधार पर अपनी चिंता जाहिर की।

वहीं, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों ने इस प्रस्ताव को लागू करने में वित्तीय चुनौतियों का हवाला दिया। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों की दलीलों पर असहमति जताते हुए कहा कि अनुभवी न्यायिक अधिकारियों को सेवा में बनाए रखना नए पदों को भरने और सेवानिवृत्ति से जुड़े खर्च की तुलना में अधिक व्यावहारिक और कम खर्चीला हो सकता है।

पीठ ने राज्यों के महाधिवक्ताओं से कहा कि वे अपने-अपने मुख्यमंत्रियों को इस मामले में नियमों का पालन करने और प्रस्ताव पर सकारात्मक तरीके से विचार करने के लिए मनाने का प्रयास करें।

इन राज्यों ने जताई सहमति सुनवाई के दौरान मध्य प्रदेश, तमिलनाडु और तेलंगाना जैसे राज्यों ने जिला अदालतों में न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति उम्र बढ़ाने के प्रस्ताव पर सहमति जताई।

सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों की अलग-अलग राय को ध्यान में रखते हुए उनसे इस मुद्दे पर दोबारा विचार करने और सकारात्मक प्रतिक्रिया देने को कहा है।

अनुभवी न्यायिक अधिकारियों को बनाए रखना कम खर्चीला’

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुभवी न्यायिक अधिकारियों के सेवा में बने रहने से राज्य पर पड़ने वाला वित्तीय बोझ उनकी सेवानिवृत्ति के बाद होने वाले खर्च से कम होगा। अदालत ने यह भी कहा कि केवल वित्तीय बोझ का हवाला देकर रिटायरमेंट उम्र बढ़ाने के प्रस्ताव का विरोध उचित नहीं है।

पीठ ने कहा कि इस महत्वपूर्ण मुद्दे को राज्यों और न्यायपालिका के बीच आपसी सहमति से सुलझाया जाना चाहिए। कोर्ट ने राज्यों को मामले पर तत्काल पुनर्विचार करने और दो सप्ताह के भीतर स्वतंत्र एवं व्यावहारिक फैसला लेने को कहा है।

रिटायरमेंट उम्र बढ़ी तो बीच में रिटायर होने वालों को भी मिलेगा लाभ

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई राज्य न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति उम्र बढ़ाने का फैसला करता है, तो इसका लाभ उन अधिकारियों को भी मिलेगा जो इस दौरान रिटायर हो चुके होंगे।

अदालत ने इससे पहले भी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से न्यायिक अधिकारियों की रिटायरमेंट उम्र 60 से बढ़ाकर 61 साल करने पर विचार करने को कहा था। 17 सितंबर को फिर होगी सुनवाई यह मामला उस याचिका से जुड़ा है जिसमें देशभर की जिला न्यायपालिका के न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति उम्र 60 से बढ़ाकर 62 साल करने की मांग की गई है। सुप्रीम कोर्ट अब इस मामले की अगली सुनवाई 17 सितंबर को करेगा। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति उम्र 65 साल, जबकि हाईकोर्ट के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति उम्र 62 साल है। ऐसे में जिला न्यायपालिका के न्यायिक अधिकारियों की रिटायरमेंट उम्र बढ़ाने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट का यह रुख काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

Friday, 10 July 2026

July 10, 2026

वाट्सएप ने यूजरनेम फीचर को लेकर केंद्र सरकार के नोटिस का जवाब दे दिया

दिल्ली वाट्सएप ने यूजरनेम फीचर को लेकर केंद्र सरकार के नोटिस का जवाब दे दिया है। सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय अब इस जवाब की समीक्षा कर रहा है। सरकार ने फिलहाल इस फीचर के रोलआउट पर रोक लगा रखी है। टेलीग्राम और सिग्नल को भी मिला है नोटिस आईटी सचिव एस कृष्णन ने बताया कि व्हाट्सएप का जवाब मिल गया है। उन्होंने यह भी कहा कि टेलीग्राम और सिग्नल जैसी अन्य मैसेजिंग ऐप्स को भी उनके मौजूदा यूजरनेम फीचर को लेकर नोटिस भेजे गए हैं। उन्हें जवाब देने के लिए अभी थोड़ा और समय मिला है। भारत में व्हाट्सएप के 50 करोड़ से ज्यादा यूजर्स हैं, जबकि टेलीग्राम के यूजर्स काफी कम हैं।IT सचिव ने क्या कहा? NDTV की रिपोर्ट के मुताबिक गुरुवार को CII GCC बिजनेस समिट के दौरान IT सचिव एस. कृष्णन ने कहा कि WhatsApp का जवाब गुरुवार तक मिलने की उम्मीद थी, जो अब मिल चुका है. उन्होंने यह भी बताया कि Telegram और Signal को भेजे गए नोटिस पर अभी उनके जवाब नहीं आए हैं, क्योंकि उन्हें जवाब देने के लिए थोड़ा और समय दिया गया है. सरकार इन सभी जवाबों की समीक्षा करेगी.क्या है WhatsApp का Username Feature? WhatsApp का नया Username Feature यूजर्स को बिना अपना मोबाइल नंबर बताए किए दूसरे लोगों से बातचीत करने की सुविधा देगा. यानी लोग अपने फोन नंबर की जगह यूजरनेम के जरिए एक-दूसरे से जुड़ सकेंगे. हालांकि, WhatsApp ने साफ किया है कि अकाउंट बनाने और इस्तेमाल करने के लिए मोबाइल नंबर पहले की तरह जरूरी रहेगा.

Tuesday, 17 February 2026

February 17, 2026

पंजाब के मुख्यमंत्री की तबीयत खराब हॉस्पिटल में किया गया भर्ती


पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान की तबीयत एक बार फिर बिगड़ गई है। इसके बाद उन्हें मोहाली के फोर्टिस अस्पताल में भर्ती कराया गया है। इससे पहले दिन में भगवंत मान को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई थी। वहां से वह मोगा की एक रैली में गए। रैली के बाद सांस लेने में दिक्कत के चलते उन्हें फिर अस्पताल में भर्ती कराया गया।

सोमवार की सुबह उनकी सेहत में सुधार के बाद डॉक्टरों ने उन्हें छुट्टी दे दी थी। अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद मुख्यमंत्री मोगा में सरकार की ओर से आयोजित युद्ध, नशे के विरुद्ध अभियान के दूसरे चरण को शुरू करने के लिए पहुंचे थे। कार्यक्रम के बाद उनकी सेहत दोबारा खराब होने पर उन्हें एक बार फिर मोहाली के फोर्टिस अस्पताल लाया गया। अस्पताल में डॉक्टरों की टीम ने उनके सभी टेस्ट दोबारा से किए।

मोगा में जनसभा को संबोधित करने के बाद मुख्यमंत्री शाम को दोबारा फोर्टिस अस्पताल पहुंच गए। जानकारी के मुताबिक, वह आज रात अस्पताल में ही रहेंगे और डॉक्टरों की निगरानी में उनका उपचार जारी रहेगा। मुख्यमंत्री की सेहत को लेकर समर्थकों में चिंता का माहौल है, जबकि डॉक्टरों की टीम उनकी नियमित मॉनिटरिंग कर रही है।

इस कार्यक्रम में लेना था हिस्सा

मुख्यमंत्री मान और केजरीवाल को 16 फरवरी को मोगा में चल रहे नशा-विरोधी अभियान के लिए आयोजित राज्य स्तरीय कार्यक्रम में भाग लेना था. पिछले वर्ष सितंबर में भी उन्हें थकान और हृदयगति कम होने की शिकायत के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया था. इससे पहले वह इसी अस्पताल में बैक्टीरिया संक्रमण के इलाज के लिए भी भर्ती हुए थे.